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केजरीवाल को राहत, राहुल की सख्ती और बादल की रैलियां-पंजाब में बदलते संकेत

मनुपाल शर्मा, भारत इंफो :  आम आदमी पार्टी (आप) सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को शराब नीति मामले में सीबीआई द्वारा दर्ज केस में क्लीन चिट मिली है। राहुल गांधी ने पंजाब दौरे के दौरान पंजाब कांग्रेस नेतृत्व को सार्वजनिक तौर पर खुलकर फटकार लगाई है। शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल लगातार रैलियां कर रहे हैं और भाजपा का अकाली दल के साथ गठबंधन फिलहाल अटकलों से ही घिरा हुआ है।

पंजाब में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर एकाएक राजनीतिक गतिविधियां तो बढ़ गई है, लेकिन स्पष्ट कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। फिलहाल पंजाब की सियासत में अटकलों का धुंधलापन ही नजर आ रहा है।

बीते एक पखवाड़े के दौरान ही पंजाब की राजनीति में बड़ी तेजी से परिवर्तन देखने को मिले हैं, जिसका असर सामने आने में कुछ महीनों का समय लग सकता है। राजनीतिक पंडितों की गणना है कि जून की तपिश पंजाब की राजनीतिक धुंध को खत्म कर देगी और उसके बाद राजनीतिक उबाल आने के पूरे आसार हैं। 2027 अभी दूर है, पर चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। गठबंधन, नेतृत्व और जमीनी मुद्दे तय करेंगे कि आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति किस दिशा में करवट लेती है।

बात करें प्रदेश की सत्तासीन आम आदमी पार्टी की तो अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को क्लीन चिट मिलने के बाद आम पार्टी ने इसे राजनीतिक सत्य की जीत के रूप में पेश किया है।

इस घटनाक्रम से पंजाब में सत्तारूढ़ दल का मनोबल बढ़ा है। भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार अब विपक्ष के आरोपों का जवाब अधिक आक्रामक तरीके से देने की स्थिति में दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह नैरेटिव मजबूती से जनता तक पहुंचता है, तो आप “पीड़ित लेकिन मजबूत” छवि गढ़ने की कोशिश करेगी।

वही, बात करें अगर कांग्रेस की तो कांग्रेस में अनुशासन की सख्ती दिखाई देने लगी है। इसे 2027 की तैयारी का संकेत माना जा रहा है। पंजाब में राजनीतिक रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी का सख्त रुख यह दर्शाता है कि हाईकमान अब ढिलाई के मूड में नहीं है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिख रही है। लीडरशिप को गुटबाजी छोड़ देना और संगठन के लिए काम करने का संदेश और कार्यकर्ता को ही सर्वोपरि बता कर राहुल गांधी ने यह संदेश भी दे दिया है कि पार्टी हाई कमान का आदेश न मानने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है। स्पष्ट है कि कांग्रेस अब काडर को मजबूत बताकर सेधने की कोशिश में है।

बीता विधानसभा चुनाव भाजपा से अलग होकर लड़ने तथा बुरी तरह से हार जाने वाला शिरोमणि अकाली दल इस समय अस्तित्व की लड़ाई में है। सुखबीर सिंह बादल खुद फील्ड में हैं और लगातार राजनीतिक रैलियां कर रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल के सामने सबसे बड़ा सवाल भाजपा के साथ संभावित गठबंधन को लेकर है।

यदि अकाली दल और भाजपा साथ आते हैं, तो शहरी हिंदू वोट और पारंपरिक अकाली वोट का समीकरण बन सकता है।
मुकाबला अधिक ध्रुवीकृत हो सकता है, लेकिन यदि दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो विपक्षी वोटों का बिखराव सत्तासीन आम आदमी पार्टी को फायदा पहुंचा सकता है। तब अकाली दल और भाजपा को अपना-अपना नुकसान झेलना पड़ सकता है।

पंजाब के मौजूदा राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं कि आप को कानूनी राहत से ऊर्जा मिली है। कांग्रेस अनुशासन और संगठन सुधार पर जोर दे रही है।

अकाली दल सक्रिय होकर अपनी जमीन तलाश रहा है। भाजपा का काडर गठबंधन को लेकर स्पष्टता न होने के चलते फिलहाल कुछ कंफ्यूज है।

2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। आने वाले महीनों में गठबंधन, नेतृत्व और जमीनी मुद्दे तय करेंगे कि पंजाब में सत्ता की कुर्सी किस पार्टी के पास जाएगी। हालांकि तब तक बेहद बड़े फैसले होंगे और राजनीतिक चर्चाओं का बाजार भी गर्म करेंगे।

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