किसी भी संभावित गुटबाजी का समय रहते अंदाजा ही नहीं लगा पाए
राजा वड़िंग-चन्नी विवाद के बीच वेणुगोपाल, बघेल, माकन और सुनील के की भूमिका पर मंथन
राहुल गांधी की वापसी के बाद बड़े फैसले के संकेत
मनुपाल शर्मा : प्रभारी, सह प्रभारी, ऑब्जर्वरों और हाईकमान की तरफ से दिग्गज शामिल कर गठित की गई हाई पावर कमेटियों के दौरों के बावजूद पंजाब कांग्रेस में उभरी गुटबाजी ने केसी वेणुगोपाल से लेकर भुपेश बघेल, अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन, सुनील के जैसे बड़े नेताओं तक की कारगुजारी पर सवालिया निशान खड़ा कर डाला है। सवाल यह खड़ा किया गया है कि अगर उपरोक्त बड़े नेता पंजाब कांग्रेस की गतिविधियों से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे तो वे समय रहते संभावित गुटबाजी के बारे में हाईकमान को किस वजह से सूचित नहीं कर पाए।
पंजाब के गठन के बाद से ही पंजाब कांग्रेस लगातार गुटबाजी का शिकार रही है। बावजूद इसके पंजाब के वोटर लगातार कांग्रेस को जीत दिलाते रहे और सरकार बनती रही लेकिन इस बार जो गुटबाजी हुई है, उसने सोनिया गांधी एवं प्रियंका गांधी तक को राहुल गांधी के विदेश से लौटने से पहले ही उपरोक्त नेताओं से सवाल पूछने तक के हालात पैदा कर दिए हैं।
सवाल ये पूछे जा रहे हैं कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को उनके अध्यक्ष पद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी हटाने संबंधी फैसला क्यों नहीं गया, हालांकि उन पर प्रदेश के आप सरकार के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के करीबी होने के आरोप लग रहे थे और पंजाब कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी उन्हें हटाने के पक्षधर थे, लेकिन अध्यक्ष, प्रभारी, सह प्रभारी और ऑब्जर्वर इस बात को हाईकमान तक पहुंचाने में नाकाम हो गए। पंजाब के सह प्रभारी बनाए गए आलोक शर्मा को किसके दबाव में कुछ ही महीनों में हटाया गया।
बिहार और महाराष्ट्र में बुरी तरह से फ्लाप रहने वाले सुनील के की कारगुजारी पर कभी विचार ही नहीं किया गया। प्रभारी भूपेश बघेल को लेकर भी नाराजगी है और एक गुट एक तरफा काम करने का आरोप भी लगा रहा है।
हालांकि अभी अनुमान यह लगाए जा रहे हैं कि राहुल गांधी के विदेश से वापस लौट के बाद पंजाब कांग्रेस के नेताओं से जो बैठक होगी, उसमें कुछ कड़े फैसले लिए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जरूर है कि मात्र 5 दिन में ही पंजाब कांग्रेस का ग्राफ बुरी तरह से नीचे गिरा है। 5 दिन पहले तक कांग्रेस को प्रदेश की सत्तासीन आम आदमी पार्टी के बाद पहले नंबर पर माना जा रहा था, लेकिन अब पंजाब कांग्रेस के भविष्य के बारे में कोई अनुमान ही नहीं लग पा रहा है। पंजाब में कांग्रेस का मजबूत संगठन है और प्रत्येक शहर, गांव और कस्बा में कांग्रेस का काडर है, जिसमें जाट, हिंदू सिख, दलित, अल्पसंख्यक और लगभग तमाम वर्गों से जुड़े हुए लोग शामिल हैं।
खतरनाक यह है कि कांग्रेस हाईकमान की तरफ से जिम्मेदार बनाकर भेजे गए वरिष्ठों ने पंजाब कांग्रेस को एक बेहद पेचीदा स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। अगर अब राजा वड़िंग को उनके पद से हटाया जाता है तो फिर आम आदमी पार्टी, भाजपा और अकाली दल समेत तमाम विपक्षी पार्टियों जाट सिखों को यह बताएंगी कि कांग्रेस उनके साथ नहीं है। अगर राजा वड़िंग को उनके पद पर बने रहने दिया जाता है तो फिर विपक्ष यह आरोप लगाएगा कि कांग्रेस ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को दलित होने की वजह से नजरअंदाज किया है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस के कई जाट सिख नेता भी चरणजीत सिंह चन्नी के साथ नजर आए हैं, लेकिन विपक्ष को कांग्रेस पर निशाना साधने का एक मौका जरूर मिला है।
प्रधानगी विवाद खत्म करने को सिद्धू भी हो सकते हैं विकल्प
पंजाब कांग्रेस की गुटबंदी तुरंत खत्म करने को लेकर बेहद संजीदा नजर आ रहा गांधी परिवार कोई कड़ा फैसला ले सकता है। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रियंका गांधी के बेहद करीब माना जाता है और यह भी संभव है कि मुख्यमंत्री का फैसला तो चुनाव के बाद होना है और उससे पहले राजा-चन्नी गुटबंदी खत्म करने को नवजोत सिंह सिद्धू को ही प्रधानगी सौंपी जा सकती हैं। हालांकि फिलहाल इसकी संभावना बेहद कम नजर आ रही है लेकिन इस विकल्प पर चर्चा जरूर शुरू हो गई है। नवजोत सिंह सिद्धू पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर हैं और राजनीतिक रैलियों में क्राउड पुलर होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।