मनुपाल शर्मा, भारत इंफो : पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी असंतोष और नेताओं की अनियंत्रित बयानबाज़ी एक बार फिर पार्टी की मुश्किलें बढ़ाती नजर आ रही हैं। हालात यह हो गए हैं कि अगर पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने समय रहते अपनी जुबान पर नियंत्रण नहीं किया तो कांग्रेस का विधानसभा चुनाव लड़ने का स्वाद ही खराब हो सकता है।
कभी धर्म, कभी जाति और अब महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी पंजाब कांग्रेस को एक बार फिर से निशाने पर ले आई है। ऐसा नहीं है कि एकाध कांग्रेस नेता ही विवादास्पद टिप्पणी कर रहा है, बल्कि खुद को शीर्ष बताने वाले और खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताने वाले नेता ही अपने शब्दों के साथ पार्टी की स्थिति को असहज बना रहे हैं।
कभी अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बयान चर्चा में आ जाते हैं, तो कभी प्रताप सिंह बाजवा की टिप्पणियां राजनीतिक हलकों में बहस का कारण बन जाती हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा भी कई बार अपने बयानों की वजह से चर्चाओं में रह चुके हैं और हाल ही में सुखपाल सिंह खैहरा की महिलाओं के प्रति सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी ने भी पार्टी को असहज स्थिति में डाल दिया है।
बीते दिनों बरनाला में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने पार्टी की वरिष्ठ लीडरशिप को सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट संदेश दिया था कि सार्वजनिक मंचों पर बयान देते समय संयम बरता जाए और संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखा जाए, लेकिन राहुल गांधी की इस चेतावनी के बावजूद पंजाब कांग्रेस के हालात सुधरते दिखाई नहीं दे रहे। अलग-अलग नेताओं के बयान पार्टी को बार-बार विवादों के केंद्र में ला रहे हैं।
पिछले कुछ समय से पंजाब कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के बीच मतभेद और बयानबाज़ी खुलकर सामने आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेताओं के बीच तालमेल की कमी और सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ अप्रत्यक्ष टिप्पणी पार्टी की छवि को पहले ही नुकसान पहुंचा चुकी है।
इससे पहले कांग्रेस को अंदरूनी कलह के चलते 2022 का चुनाव हारने का कटु अनुभव भी हो चुका है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने और पंजाब कांग्रेस की बागडोर नवजोत सिंह सिद्धू को सौंप देने तथा मुख्यमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री बनने की चूहा दौड़ ने पंजाब के वोटरों का कांग्रेस के प्रति मोह भंग कर डाला था। बावजूद इसके पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने इसका कोई सबक नहीं लिया है। समय-समय पर पंजाब कांग्रेस को बड़ी पार्टी बताने तथा पार्टी में लोकतंत्र होने का कुतर्क देकर लगातार भद्दी शब्दावली प्रयोग में लाई जा रही है।
पंजाब में आने वाले समय में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। ऐसे समय में यदि पार्टी के वरिष्ठ नेता बिना सोचे समझे बयानबाजी करेंगे और एकजुटता का संदेश देने की बजाय अलग-अलग स्वर में बोलते दिखाई देंगे, तो इसका सीधा असर संगठनात्मक मजबूती पर पड़ सकता है।
कांग्रेस पहले ही राज्य में सत्ता से बाहर है और उसे अपने जनाधार को दोबारा मजबूत करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आंतरिक असहमति का सार्वजनिक होना और भद्दी शब्दावली प्रयोग में लाना पंजाब की सत्तासीन आम आदमी पार्टी के अलावा विपक्षी दलों को हमला बोलने का मौका दे रहा है।
चुनावी साल में किसी भी पार्टी के लिए संगठनात्मक अनुशासन बेहद अहम होता है। यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं करता, तो यह मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है। अब भी यदि यही स्थिति बनी रहती है तो आगामी विधानसभा चुनाव में पंजाब कांग्रेस को एक बार फिर से वोटरों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।
फिलहाल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सभी नेता सामूहिक रूप से संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दें। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पंजाब कांग्रेस के नेता चुनावी साल में अपने मतभेदों को किनारे रखकर एकजुटता का प्रदर्शन कर पाते हैं या फिर बयानबाज़ी का यह सिलसिला पार्टी की चुनावी रणनीति पर भारी पड़ता है।