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अकाली सियासत में नए समीकरण! चंदूमाजरा की वापसी से सुखबीर बादल को मिलेगा सहारा

अकाली दल की बिखरी हुई ताकत को दोबारा एकजुट करने की कोशिश

बागियों की घर वापसी की भी खुलेगी राह

 

मनुपाल शर्मा, पटियाला

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले शिरोमणि अकाली दल (बादल) में राजनीतिक समीकरण बदलने के संकेत मिलने लगे हैं। वरिष्ठ अकाली नेता एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, उनके बेटे हरिंदरपाल सिंह चंदूमाजरा और समर्थकों की पार्टी में वापसी को अकाली राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

6 नवंबर को सुखबीर सिंह बादल का खुद पटियाला स्थित चंदूमाजरा के आवास पर पहुंचकर उन्हें पार्टी में शामिल करवाना महज एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि अकाली दल की बिखरी हुई ताकत को दोबारा एकजुट करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

बागियों को वापस लाने की रणनीति

2024 में सुखबीर बादल के नेतृत्व और पार्टी की कार्यप्रणाली से नाराज होकर कई वरिष्ठ नेताओं ने अकाली दल से दूरी बना ली थी। इनमें चंदूमाजरा जैसे प्रभावशाली नेता भी शामिल थे। अब उनकी वापसी से पार्टी नेतृत्व को उन दूसरे नेताओं तक पहुंचने का रास्ता मिल सकता है, जिन्होंने अलग-अलग कारणों से पार्टी छोड़ी थी। चंदूमाजरा ने भी पंथक और अकाली संगठनों को एक मंच पर लाने की वकालत की है। ऐसे में उनकी वापसी को व्यापक अकाली एकता की कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है।

शिअद भाजपा गठबंधन की चर्चाओं के बीच वापसी

दूसरी ओर, पंजाब में 2027 के चुनाव से पहले अकाली दल और भाजपा के बीच संभावित गठबंधन को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ चंदूमाजरा की हालिया मुलाकात और उसके बाद अकाली एकता को लेकर दिए गए उनके बयानों ने इन चर्चाओं को और हवा दी है। हालांकि गठबंधन को लेकर अभी कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

सुखबीर के सामने बड़ी चुनौती

अकाली दल के सामने केवल पुराने नेताओं की वापसी ही चुनौती नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर विश्वास बहाली, पंथक संगठनों के साथ बेहतर तालमेल और पंजाब में अपने राजनीतिक आधार को फिर से मजबूत करने का सवाल भी है। चंदूमाजरा परिवार की वापसी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हो सकती है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या इससे अन्य नाराज अकाली नेता भी वापस लौटते हैं और क्या पार्टी व्यापक पंथक एकता की दिशा में आगे बढ़ पाती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 के चुनाव से पहले पंजाब की अकाली राजनीति में पुनर्गठन और नए राजनीतिक समीकरण बनाने की प्रक्रिया तेज होती दिखाई दे रही है।

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