Wednesday, October 28, 2026
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कांशीराम से राहुल तक… दलित पॉलिटिक्स में कप्तान को मजबूती दे रहे कोटली!

बसपा से कांग्रेस तक का सफर तय करने वाले सुखविंदर सिंह कोटली अब परगट सिंह के सियासी सिपहसालार के रूप में सक्रिय

दिल्ली से अमृतसर और डेरा बल्लां तक साथ दिखने के गहरे राजनीतिक मायने

मनुपाल शर्मा, जालंधर

पंजाब कांग्रेस के नए कप्तान परगट सिंह प्रदेश की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कवायद में जुटे हैं। इस सियासी रणनीति में आदमपुर के विधायक सुखविंदर सिंह कोटली की बढ़ती सक्रियता खास मायने रखती है। कभी बसपा संस्थापक स्वर्गीय कांशीराम के विचारों के साथ राजनीति शुरू करने वाले कोटली अब कांग्रेस में राहुल गांधी की पार्टी और परगट सिंह की अगुवाई के बीच दलित राजनीति की एक अहम कड़ी बनते नजर आ रहे हैं।

कोटली का राजनीतिक सफर बहुजन समाज पार्टी से शुरू हुआ था। बसपा संस्थापक स्वर्गीय कांची राम की विचारधारा के साथ काम करने वाले कोटली ने बाद में तत्कालीन नेतृत्व पर कांशीराम के मूल सिद्धांतों से समझौता करने का आरोप लगाते हुए पार्टी से दूरी बना ली। दलित राजनीति में अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचान बनाने वाले कोटली ने कांग्रेस का दामन थामा और 2022 के विधानसभा चुनाव में आदमपुर से जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की।

उनकी इस जीत को इसलिए भी अहम माना गया, क्योंकि उस समय पंजाब में आम आदमी पार्टी 92 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी। कोटली ने आदमपुर में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले पवन कुमार टीनू को शिकस्त देकर अपनी सियासी हैसियत का एहसास कराया। हालांकि उनकी उम्मीदवारी और चुनावी जीत में परगट सिंह की भूमिका भी अहम रही।

अब कप्तान के साथ कोटली की बढ़ती नजदीकियां चर्चा में

परगट सिंह के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कोटली की उनके साथ लगातार मौजूदगी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन रही है। दिल्ली से अमृतसर तक और फिर डेरा बल्लां में उनकी उपस्थिति को महज औपचारिक राजनीतिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दलित राजनीति की जमीनी समझ रखने वाले कोटली परगट सिंह के लिए एक ऐसे राजनीतिक सहयोगी साबित हो सकते हैं, जो दोआबा की सामाजिक और चुनावी परिस्थितियों को समझते हैं। खासकर उस क्षेत्र में, जहां दलित मतदाताओं की भूमिका पंजाब की चुनावी राजनीति में निर्णायक मानी जाती है।

परगट सिंह के सामने चुनौती केवल प्रदेश कांग्रेस को एकजुट करने की नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों और राजनीतिक समूहों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने की भी है। ऐसे में कोटली की सक्रियता उन्हें दलित राजनीति में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर दे सकती है। दोआबा दलित बहुल क्षेत्र है और कोटली इसके अंतर्गत आती दो दर्जन से ज्यादा सीटों के पूरी तरह से जानकार भी हैं। आंकड़ों के साथ अपना तर्क रखने में महारत हासिल कोटली महज साढ़े चार साल में कांग्रेस में उसे स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां उनके जूनियर होने अथवा सीनियर राजनीतिज्ञ वाली समझ रखने को लेकर कयास लगने ही बंद हो चुके हैं। संदेश साफ है कि कोटली लंबी राजनीति करने वाली समझ रखते हैं।

 

कांशीराम की विचारधारा से राहुल गांधी तक

कोटली की राजनीतिक यात्रा अपने आप में कांग्रेस की बदलती सियासी जरूरतों की कहानी भी है। बसपा की राजनीति से निकले कोटली आज कांग्रेस के भीतर अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं। वहीं, परगट सिंह के लिए उनकी मौजूदगी दोआबा में दलित सियासत को समझने और उससे जुड़ने का एक अहम माध्यम बन सकती है और फिलहाल बनती हुई नजर भी आ रही है। फिलहाल, कप्तान के साथ कोटली की बढ़ती नजदीकियां संकेत दे रही हैं कि पंजाब कांग्रेस में सामाजिक समीकरणों को साधने की सियासी कवायद तेज हो चुकी है।

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