Wednesday, October 14, 2026
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वारिस पंजाब दे और बसपा में हो सकता है समझौता!

 

 

पंजाब विधानसभा चुनाव में नए राजनीतिक समीकरण की सुगबुगाहट

 

मनुपाल शर्मा, जालंधर

पंजाब में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में एक उलटफेर देखने को मिल सकता है। जेल में बंद होने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में भारी मतों से जीत दर्ज करने वाले अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन संभव हो सकता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के प्रमुख और खडूर साहिब से सांसद भाई अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह समेत संगठन की वरिष्ठ लीडरशिप ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की शीर्ष लीडरशिप से मुलाकात की है। चंडीगढ़ के किसान भवन में बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित एक सेमिनार के दौरान भी दोनों पक्षों के बीच अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला और तेज हुआ है, जिसकी अध्यक्षता स्वयं तरसेम सिंह ने की थी।

इस मुलाक़ात के बाद पंजाब के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि यदि दोनों पार्टियों के बीच चुनावी गठबंधन होता है, तो यह पंजाब विधानसभा चुनाव में एक बिल्कुल नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दे सकता है।

वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर मनप्रीत सिंह अयाली की फोटो लगा एक पोस्टर भी वायरल हो रहा है कि वारिस पंजाब दे और बसपा में समझौता हो सकता है। समझौते के लिए बैठकों का दौर चल रहा है।

 

दोआबा क्षेत्र में खलबली, बसपा के पारंपरिक कैडर पर नजर

पंजाब और विशेष रूप से दोआबा क्षेत्र के कई विधानसभा क्षेत्र (जैसे जालंधर, होशियारपुर, और नवांशहर) ऐसे हैं जहां पर बसपा का पुराना और बेहद मजबूत कैडर-आधारित वोट बैंक आज भी मौजूद है। हालांकि, बसपा का वोट शेयर पिछले कुछ चुनावों में गिरा है, लेकिन ज़मीनी पकड़ अब भी प्रभावी है। गठबंधन होने की स्थिति में यह परंपरागत दलित और कैडर वोट सीधे तौर पर ‘वारिस पंजाब दे’ के पक्ष में ट्रांसफर हो सकता है।

 

‘वारिस पंजाब दे’ का बढ़ता जनाधार और दलित समुदाय तक पहुंच

जेल में बंद होने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में भारी मतों से जीत दर्ज करने वाले अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ पंजाब के कई क्षेत्रों में सिख और विशेष रूप से युवा मतदाताओं का ध्यान अपनी तरफ लगातार आकर्षित कर रही है। अब पार्टी अपनी पारंपरिक ‘पंथक’ छवि से आगे बढ़कर दलित समुदायों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। बसपा के संगठनात्मक ढांचे और वारिस पंजाब दे के वर्तमान जनसमर्थन का यह मेल एक मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा कर सकता है।

पारंपरिक दलों की बढ़ी चिंताएं

इस संभावित गठबंधन की सुगबुगाहट ने पंजाब की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप), कांग्रेस, और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पहले ही ‘अकाली दल (वारिस पंजाब दे)’ पर तीखे हमले बोल चुके हैं, जिससे स्पष्ट है कि पारंपरिक दल इस उभरते हुए मोर्चे को एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

बसपा पंजाब लीडरशिप के मुताबिक दोनों दलों के बीच अनौपचारिक बातचीत चल रही है, लेकिन गठबंधन पर अंतिम फैसला पार्टी सुप्रीमो मायावती द्वारा ही लिया जाएगा। यदि यह गठबंधन जमीन पर उतरता है, तो पंजाब का आगामी मुकाबला पूरी तरह से बहुकोणीय और बेहद दिलचस्प हो जाएगा।

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