मनुपाल शर्मा, भारत इंफो : पंजाब की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। देश के गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने मोगा में आयोजित एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए साफ कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले ही लड़ेगी।
इस घोषणा ने राज्य की सियासत में नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि यदि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन नहीं होता, तो दोनों ही दलों के लिए सत्ता तक पहुंचना बेहद कठिन हो सकता है। बीते लंबे समय से खड़ा किया गया यही नैरेटिव इस कदर दोनों पार्टियों के काडर तक पहुंच चुका है कि यह दिखाई देने लगा है कि अगर दोनों पार्टियां गठबंधन नहीं करती हैं तो फिर दोनों फिर दोनों ही पार्टियां सत्ता में आ ही नहीं सकती हैं।
यह नैरेटिव खड़ा करने से पहले अकाली भाजपा की तरफ से लगातार गठबंधन की अटकलें भी लगती रही और दोनों ही पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व समय-समय पर बयान बाजी भी करता रहा।
पंजाब में पहले से ही यह राजनीतिक नैरेटिव बन चुका है कि यदि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन नहीं होता, तो दोनों दलों को अपने पारंपरिक वोट बैंक में भी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन कई दशकों तक पंजाब की राजनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ रहा था। लेकिन 2020–2021 में कृषि कानूनों को लेकर चल कृषि आंदोलन के दौरान दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए थे। इसके बाद से दोनों दल अलग-अलग राजनीतिक रणनीति के साथ मैदान में हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो वोटों का विभाजन हो सकता है, परंपरागत वोट बैंक से भी कुछ हद तक हाथ धोना पड़ सकता है, जिसका सीधा लाभ किसी तीसरे दल को मिल सकता है।
जाहिर सी बात है अगर दोनों ही पार्टियों में गठबंधन नहीं होता है तो फिर नैरेटिव के मुताबिक दोनों पार्टियों सत्ता में आ ही नहीं सकती हैं। जब सरकार बनती ही नजर नहीं आएगी तो वोट टूटने के आसार भी ज्यादा हो जाएंगे।
वहीं दूसरी तरफ अमित शाह की इस रैली पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मोगा की रैली में भाजपा के मंच पर मौजूद नेताओं की सूची ही पंजाब में पार्टी की वास्तविक स्थिति को दिखाती है। मान के अनुसार मंच पर पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़, रवनीत सिंह बिट्टू फतेह जंग सिंह बाजवा और मनप्रीत सिंह बादल जैसे नेता मौजूद थे, जो पहले अन्य दलों से जुड़े रहे हैं। भाजपा में नेताओं की ही कमी है।
मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा के पास पंजाब की 117 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के लिए भी पर्याप्त उम्मीदवार नहीं हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमित शाह ने अपनी रैली में पंजाब के लिए कोई ठोस घोषणा नहीं की।
दूसरी ओर पंजाब में कांग्रेस भी इस समय आंतरिक कलह से जूझ रही है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे पार्टी की छवि को नुकसान पहुंच रहा है।
हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पंजाब में एक रैली के दौरान सार्वजनिक रूप से प्रदेश नेतृत्व को अनुशासन में रहने की नसीहत दी थी। उन्होंने यहां तक चेतावनी दी थी कि यदि वरिष्ठ नेता बयानबाजी से बाज नहीं आए, तो उन्हें “रिजर्व” में भी डाला जा सकता है।
इससे साफ है कि कांग्रेस फिलहाल आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है, जो चुनावी रणनीति को कमजोर कर सकता है।
इन सभी राजनीतिक परिस्थितियों के बीच सबसे अधिक फायदा प्रदेश की सत्तासीन आम आदमी पार्टी को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं और कांग्रेस आंतरिक अनुशासनहीनता से जूझती रहती है, तो आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता में वापसी का रास्ता आसान हो सकता है।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आम आदमी पार्टी सरकार की तरफ से महिलाओं को प्रतिमाह आर्थिक सहायता देने की शुरुआत भी पार्टी की स्थिति को मजबूत बना रही है।
हालांकि, पंजाब की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित रही है। चुनाव के नजदीक आते-आते गठबंधनों, दल-बदल और नए राजनीतिक समीकरणों से तस्वीर बदल भी सकती है।
मोगा रैली में अमित शाह की घोषणा ने यह तो साफ कर दिया है कि भाजपा पंजाब में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। लेकिन यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल पंजाब की राजनीति में तीन बड़े सवाल चर्चा में हैं। पहला यह कि क्या भाजपा अकेले दम पर प्रभावी चुनौती दे पाएगी? दूसरा यह कि क्या अकाली दल और भाजपा के अलग होने से विपक्ष मजबूत होगा? और तीसरा यह कि क्या इन परिस्थितियों में आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता में वापसी कर पाएगी? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति की दिशा तय करेंगे।