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KPS Gill की लगवा दी थी दौड़, विरोधियों पर भारी पड़ते हैं ‘कप्तान’

 

कुर्सी के लालच से ज्यादा सिद्धांतों को तरजीह

 

अपनी ही सरकारों के खिलाफ आवाज उठाने से नहीं किया परहेज

 

 

 

मनुपाल शर्मा, जालंधर

कभी अकाली सरकार के खिलाफ आवाज, कभी अपनी ही कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री से सवाल, कभी संगठन के भीतर असहमति और अब पंजाब कांग्रेस की कमान। सफर बताता है कि ‘कप्तान’ की राजनीति में टकराव भी रहे हैं और रणनीति भी।

पंजाब की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी पहचान सिर्फ किसी पार्टी, पद या चुनावी जीत से नहीं बनती। पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान परगट सिंह भी ऐसा ही नाम हैं। हॉकी के मैदान पर फुल बैक की भूमिका निभाने वाले परगट सिंह ने राजनीति में भी अपने खेल की शैली को काफी हद तक कायम रखा—सामने वाले के हमले को रोकना, सही समय पर रणनीति बदलना और जरूरत पड़ने पर आगे बढ़कर जवाब देना।

2 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस ने उन्हें पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है जब पंजाब कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौर से गुजर रहा है।

हॉकी के मैदान का कप्तान

मिट्ठापुर की हॉकी परंपरा से निकले परगट सिंह भारतीय हॉकी के उन खिलाड़ियों में रहे जिन्होंने डिफेंस को केवल बचाव की भूमिका नहीं रहने दिया। वह फुल बैक के रूप में खेले और 1988 सियोल, 1992 बार्सिलोना तथा 1996 अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। बार्सिलोना और अटलांटा में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की। अटलांटा ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में वह भारत के ध्वजवाहक भी रहे।

1986 एशियाई खेलों में कांस्य और 1990 एशियाई खेलों में रजत पदक उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं। 1989 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार और 1998 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

उनके खेल करियर की एक खास बात यह रही कि वह डिफेंस में रहते हुए भी खेल को पढ़ने और मौके के अनुसार आक्रमण में योगदान देने के लिए जाने जाते थे। यही वजह है कि परगट सिंह की राजनीतिक शैली को समझने के लिए उनके हॉकी करियर को नजरअंदाज करना मुश्किल है।

अपने ही DGP KPS Gill से मतभेद भी हुए

परगट सिंह का नाम पंजाब के पूर्व DGP KPS Gill के साथ हॉकी के संदर्भ में भी जुड़ा रहा। Gill भारतीय हॉकी महासंघ के अध्यक्ष रहे थे। 1990 के दशक के अंत में हॉकी टीम के सपोर्ट स्टाफ को लेकर परगट सिंह और Gill के बीच मतभेद हुआ था। परगत सिंह उस समय पंजाब पुलिस में SP के पद पर थे जबकि केपीएस गिल DGP थे

यानी मैदान पर कप्तान और प्रशासन के बीच असहमति होने पर भी परगट सिंह ने अपनी बात रखने से परहेज नहीं किया। यही गुण बाद में उनकी राजनीतिक पहचान का भी हिस्सा बना। हालांकि गिल को परगट सिंह के रवैया से खासी तकलीफ हुई थी लेकिन परगट सिंह अपने तर्क से पीछे नहीं हुए थे। तिलमिलाए केपीएस गिल को पंजाब पुलिस के आला अधिकारियों को यहां तक कहना पड़ा कि CAN’T YOU CONTROL THIS SP

 

राजनीति में भी ‘फुल बैक’ की भूमिका

2012 में परगट सिंह ने शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर जालंधर कैंट से विधानसभा चुनाव जीता। लेकिन पार्टी नेतृत्व से मतभेद बढ़े और 2016 में उन्हें निलंबित किया गया। इसके बाद उन्होंने अकाली दल छोड़ दिया, नवजोत सिंह सिद्धू और बैंस बंधुओं के साथ ‘आवाज-ए-पंजाब’ मंच से जुड़े और फिर कांग्रेस में आए।

दिलचस्प बात यह है कि जिस राजनीति में दल बदलने को अक्सर अवसरवाद के चश्मे से देखा जाता है, वहां परगट सिंह के मामले में उनका रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकारों और नेतृत्व के खिलाफ सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए।अकाली सरकार के दौरान जालंधर कैंट के जंडूसिंघा-जमशेर क्षेत्र में प्रस्तावित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को लेकर उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ रुख अपनाया। 2016 में उन्हें Chief Parliamentary Secretary का पद ऑफर किए जाने की रिपोर्ट भी आई, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ भी खोला मोर्चा

कांग्रेस में आने के बाद भी परगट सिंह ने अपनी आवाज को पार्टी लाइन तक सीमित नहीं रखा। 2021 में वह उन नेताओं में थे जिन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने बेअदबी, ड्रग्स, खनन, बिजली समझौतों और बरगाड़ी/बहिबल कलां जैसे मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा।

अप्रैल 2021 में उन्होंने अमरिंदर सिंह के नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक तौर पर आलोचना की और कहा कि मुख्यमंत्री को अपनी सरकार के प्रति लोगों की धारणा पर ध्यान देना चाहिए। बाद के महीनों में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर हुए घटनाक्रम में भी परगट सिंह सक्रिय नेताओं में रहे। नाम माझा ब्रिगेड का रहा लेकिन गुप्त रणनीति बनाने में कप्तान की भूमिका नजरअंदाज नहीं हो सकती। हालांकि इसके बाद वह मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की कैबिनेट में शिक्षा मंत्री भी रहे।

इसी वजह से पंजाब की राजनीति में उनके बारे में यह धारणा बनी कि परगट सिंह पद से ज्यादा अपनी बात को महत्व देने वाले नेताओं में हैं। हालांकि उनके हर राजनीतिक कदम और उसके पीछे की मंशा का अंतिम आकलन राजनीतिक पर्यवेक्षकों और जनता पर ही छोड़ना होगा।

दरबारा सिंह परिवार से रिश्ता भी राजनीतिक विरासत का हिस्सा

परगट सिंह का विवाह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय दरबारा सिंह के परिवार में हुआ। दरबारा सिंह का पंजाब कांग्रेस और दोआबा की राजनीति में लंबा प्रभाव रहा था। लेकिन परगट सिंह की अपनी राजनीतिक यात्रा केवल पारिवारिक विरासत पर आधारित नहीं रही। उन्होंने पहले अकाली दल के टिकट पर चुनाव जीता, फिर कांग्रेस में आकर लगातार जालंधर कैंट का प्रतिनिधित्व किया और 2022 में आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत के बावजूद अपनी सीट बरकरार रखी।

अब चुनौती हॉकी के मैदान से कहीं बड़ी

2026 में पंजाब कांग्रेस की कमान मिलने के साथ परगट सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को संभालने की है। कांग्रेस नेतृत्व ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। ऐसे समय में जब पंजाब की राजनीति बहुकोणीय मुकाबले, संगठनात्मक खींचतान और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से गुजर रही है, उनकी भूमिका महज प्रदेश अध्यक्ष की नहीं बल्कि पार्टी के भीतर अलग-अलग धाराओं के बीच तालमेल बनाने की भी होगी।

हॉकी में फुल बैक का काम केवल गोल बचाना नहीं होता, उसे पूरे मैदान को पढ़ना पड़ता है। कब पीछे हटना है, कब विपक्षी हमले को रोकना है और कब अचानक आगे बढ़कर खेल की दिशा बदलनी है, यही उसकी असली परीक्षा होती है। परगट सिंह की राजनीतिक कहानी में भी यही समानता दिखाई देती है। अब देखना यह है कि हॉकी के इस फुल बैक का राजनीतिक कप्तानी वाला खेल पंजाब कांग्रेस को किस दिशा में ले जाता है।

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