भारत इंफो : आज दुनिया तेजी से दो या अधिक धड़ों में बंटती जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। यूक्रेन से लेकर पश्चिम एशिया तक कई क्षेत्रीय संघर्ष चल रहे हैं, जिनके कारण देशों पर किसी एक पक्ष को चुनने का दबाव बनता है। ऐसे समय में भारत ने “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपनाई है।
रणनीतिक स्वायत्तता का सीधा अर्थ है—भारत अपने राष्ट्रीय हितों के बारे में खुद फैसला करेगा। यह पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति का नया और मजबूत रूप है। अब भारत केवल तटस्थ नहीं रहता, बल्कि अपने हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करता है। इसे “मल्टी-अलाइनमेंट” भी कहा जाता है।
भारत सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, तकनीक और संप्रभुता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय लेना चाहता है। उदाहरण के लिए, भारत अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है। वहीं रूस से ऊर्जा और रक्षा उपकरण भी लेता है। चीन के साथ सीमा विवाद होने के बावजूद व्यापारिक संबंध जारी रखता है। इसका उद्देश्य है कि कोई भी एक देश भारत पर दबाव न बना सके।
पश्चिम एशिया में भी भारत संतुलित नीति अपनाता है। इज़राइल के साथ भारत के मजबूत संबंध हैं। रक्षा क्षेत्र में ‘बराक-8’ जैसी संयुक्त परियोजनाएँ, कृषि में ड्रिप सिंचाई तकनीक, जल प्रबंधन और नई तकनीकों में सहयोग इसके उदाहरण हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार भी लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत केवल इज़राइल के साथ खड़ा है।
भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे अरब देशों के साथ भी मजबूत रिश्ते रखता है। वह फ़िलिस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है और मानवीय सहायता देता है। साथ ही ईरान के साथ भी संवाद बनाए रखता है। इस तरह भारत सभी देशों के साथ संतुलन बनाकर चलता है।
आज की ध्रुवीकृत दुनिया में रणनीतिक स्वायत्तता भारत के लिए सुरक्षा कवच की तरह है। इससे भारत अपने हितों की रक्षा कर सकता है, नए अवसर खोज सकता है और अपने नागरिकों के लिए बेहतर सुरक्षा, रोजगार और विकास सुनिश्चित कर सकता है।
जैसे-जैसे दुनिया में विभाजन बढ़ रहा है, भारत की यह स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति एक परिपक्व और समझदारी भरा रास्ता दिखाती है। यह न तो किसी से दूरी बनाना है और न ही किसी के पीछे चलना—बल्कि आत्मविश्वास के साथ अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ना है।